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रविवार, 24 अगस्त 2014

बैल व्यव्हार

बैल व्यव्हार

बहुत दिनों से मेरे मुहल्ले के बच्चे मुझसे कुछ कहने के लिए कह रहे थे और मैं अपनी व्यस्तता के कारण उनको किसी न  किसी बहाने से टाल रहा था।  परन्तु कल उन्हों ने हठ किया और अपने मन की बात कह दी।

बच्चे :                               अंकल हमारे मम्मी  पापा,  चाचा - चाची, ताया- ताई और सभी बड़े हम पर विश्वास नहीं करते।

मैं बोला :                           बच्चो , यह आप को कब और कैसे जानकारी हुई ?

बच्चे : जब भी हम लोग बाहर जाते हैं हमारे बड़े हमारे से सौ सवाल पूछते हैं।  कहाँ गए थे ? बता कर क्यों नहीं गए ? जाने से पहले बड़ों को बताना फ़र्ज़ नहीं है? तुम्हारा फोन भी बंद था ? आज जमाना कैसा है तुम्हे पता 
है ? ऐसे सब प्रशन हमें बहुत परेशान  करते हैं ? हम सम्पूर्ण मन से अपने दोस्तों से मिल भी नहीं सकते।  समय की पाबंदी। हम बहुत परेशान हैं।  आप बड़े हैं हमें इस समस्या का हल बताएं।

मैं मुस्कराया।

बच्चे और हैरान ब परेशान कि अंकल मुस्करा कियूं रहे हैं ?

अन्त में बच्चों ने पूछ ही लिया :     अंकल आप  हंस क्यों रहे हैं?

बचो मुझे अपने विद्यार्थी काल की एक घटना यानी कहानी याद आ गई है ?- मैंने उत्तर दिया।

कहानी का नाम सुनते ही बच्चे अपनी परेशानी भूल गए और मुझ पर कहानी सुनाने के लिए जोर डालने लगे।

हाँ तो आप की परेशानी क्या थी?                                  मैंने पुछा।

नहीं परेशानी बाद में , पहले कहानी                              बच्चे

बच्चों की इस उत्सुकता को देखते हुए मैंने कहा : अच्छा तो सुनो कहानी।

सभी बच्चे अनुशासित हो कर कुर्सियों पर बैठ गए।  कुछ छोटे बच्चे शरारतें कर रहे थे।  उनको बड़े बच्चों ने फटकार लगा चुप होकर बैठने को कहा।

तो बच्चो सुनो।  बात  उन दिनों की है जब आप के अंकल यूनिवर्सिटी में पड़ा करते थे।

छोटे बचे हसने लगे: हा हा हा एंकल भी पढ़ते थे।  मार पड़ती थी ?            हाँ पड़ती थी। 
सभी बच्चे बड़े जोर से हँसे।

कहानी  शुरू :  जब हम बच्चे थे तो   हमे भी अच्छा नहीं लगता था कि हमारे माँ बाप या बड़े बजुर्ग हमसे आने जाने के बारे में क्यों पूछते हैँ ?

हम बच्चों ने अपने प्रोफेसर से यह बात की और हमारे प्रोफेसर ने यह कहानी सुनाई ? सुनायुं ?

सुनायो  न अंकल !

तो सुनो।

एक गरीब किसान था।  बह और उसकी पत्नी दोनों खुद अपना हल जोत कर अपनी जमीन की बोयाई करते क्यूंकि बैल तो उनके पास थे  नहीं।

इतने गरीब थे ? बच्चों ने पूछा।

हाँ बहुत गरीब थे।

किसी द्याबान किसान ने उनको एक बछड़ा दान में दे दिया।  इस  किसान ने प्यार से इस बछड़े का नाम "दिनू" रख दिया।  बछड़ा बड़ा हो होता गया। 

कुछ दिनों के बाद किसी और गाँब के दानी किसान ने इस किसान को एक बछड़ा (गाय या भैंस का बच्चा ) दे दिया।

किसान और उसका परिवार बहुत खुश था कि अब उनके पास दो बछड़े हैं।  जब यह बछड़े बड़े होंगे तो उनको हल ख़ुद नहीं जोतना पड़ेगा बल्कि यह बैल उनके जीवन का पालन पोषण करेंगे और जीवन आसान हो जायेगा।

इस नए बछड़े को प्यार से "दिवेश " पुकारने लगे।

बच्चे बड़ी उत्सुकता से सुन रहे थे। 

बछड़े खेलते कूदते चारा खाते पानी पीते सभी को अच्छे  लगते। कई बार तो बछड़े कपड़े तक खा जाते।  जब बीमार होते तो किसान दूर के हस्पताल से पशुओं के डॉक्टर को बुलाता और  बच्छड़ों का  इलाज़ ब दवाई करवाता।  जब बछड़े बीमार होते या उनको चोट लगती तो घर के सभी छोटे बड़े बड़े चिन्तित रहते।  जब तक कि बछड़े ठीक नहीं हो जाते।  जब बछड़े पूर्ण रूप से चारा खाने लगते तभी किसान ब उसके परिवार बाले मन से खाना खाने लगते।

आहिस्ता आहिस्ता बछड़े बड़े हो गए समय बैल बन गए।

किसान बहुत खुश था कि उसके पास दो बैल हैं।  गाँब के लोग भी बातें करते कि किसान के दिन अब अच्छे आ रहे हैँ।  अब किसान खुश रहा करेगा।

किसान ने दो घंटों खरीदी और बैलों के गले में बांद दी।

घण्टियों की आबाज से ही किसान की पत्नी को पता चल जाता कि बैल जंगल से चार कर आ गए हैं।

एक दिन किसान ने सोचा कि अब समय आ गया है कि बैलों को हल से जोता  जाए।

अँकल बैल को कैसे जोता जाता है ? एक छोटे से बच्चे ने पुछा।

बेटे हल खेत को जोतने बाली यंतिरिका होती है
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किसान और उसकी पत्नी ने सभी तैयारों की और दोनों बैलों को खेत में ले जा कर एक नारियल फोड़ा
, प्रार्थना की और बैलों को हल से जोड़ा।  परन्तु ये क्या "दीनू " तो चुपचाप शांति से हल से जुड़ा खड़ा है परन्तु "दिवेश " हल से जुड़ ही नहीं रहा और हल को तोड़ कर भागने की कोशिश कर रहा है। 

किसान ने बहुत कोशिश की परन्तु सफलता न मिली।  वह निराश हो गया।  कई दिन यही सिलसिला चलता रहा परन्तु "दिवेश" जिम्मेबारी लेने को तैयार ही नहीं था।

एक दिन हार कर किसान ने "दिवेश " को खुला छोड़ दिया। "दिवेश" बहुत खुश था।  जंगल में घूमता ,अपनी मर्जी की घास खाता, नदी  से पानी पीता और अपनी मर्जी से खुले जंगल में सो जाता।  आजादी ही आजादी।  कोई रोक टॉक नहीं कोई जिम्मेबारी नहीं।

छः महीने बीत गए बड़े माझे से।  एक दिन 'दिवेश " अपने पुरे मन से जंगल मैं भाग रहा था ताजा कि इसके सीँग एक झाड़ी ममें फंस गए।  "दिवेश" ने बहुत कोशिश कि सीँग छूट जाए परन्तु सींग नहीं छूटे बल्कि एक सींग टूट गया।  बहुत दर्द हुआ।  बहुत खून बहा।  "दिवेश" बहुत तड़फा।  बहुत चिल्लाया।  परन्तु जंगल में वह अकेला था इस लिए कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आया।  किसान को भी पता न लगा।  घाब से खून बहता रहा।  थोड़े दिनों के बाद घाब में कीड़े पैदा हो गए। 

आहिस्ता, आहिस्ता यह कीड़े सारे शरीर मैं फेल गए और "दिवेश " की असमय मौत हो गई।

अब "दीनू" की सुनो।  "दीनू " सुबह ताजा हरा चारा खाता।  किसान या उसकी पत्नी हर रोज़ उसकी मालिश करती।  "दीनू" और किसान फिर खेत मैं चले जाते।  किसान उसे बड़े प्यार से हल से जोतता और अपना खेत की बोयई करता।  दोपहर को किसान अपना खाना खता तो 'दीनू" को भी पेड़ की छाया के नीचे बांड देता।  हरा चारा डालता, पीने के लिए पानी डालता।  संध्या समय "दीनू " ब "किसान दोनों घर  आते।  किसान का बीटा दीनू की मालिश करता और चारा डालता।

फिर "दीनू " आराम से सो जाता।  जब "दीनू" बीमार होता किसान भाग कर साथ बाले गायों से डॉक्टर को लेकर आता  और दवाई दारू करता।  तब तक घर में ख़ुशी नहीं आती जब तक ":दीनू " ठीक नहीं हो जाता।  "दीनू" था तो बैल परन्तु सभी उससे घर के सदस्य की तरह ही प्यार करते।

बच्चो जो बचे अपनी जिमेदारी को समझते हैं अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हैं वह जीवन मे सुख भोगते हैं और उनका जीवन भी लम्बा होता है।

आप "दीनू" बनोगे या "दिवेश"

अंकल "दीनू "

माता पिता किसान है हमारा बेलगाम आजाद गैर जिम्मेबार व्यवहार "दिवेश " जिम्मेबार व्यवहार अनुशाषित जीवन "दीनू " है।

अब बच्चों के माता पिता आते हैं और पूछते हैं की आप ने बच्चों को क्या कहा।  बच्चे भी मुस्कराते हैं मैं भी।  यह कहानी तो मुझे और बच्चों को पता है।  परन्तु उनके व्यव्हार का बदलाब माता पिता को महसूस हो रहा है।







 

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

TO YOURSELF

You want your freedom so desperately.
There's no place in your heart for anyone else.
Though I will admit there is some chemistry,
I won't be some trophy collecting dust on the shelf.

Never felt so alone, so alone.
I'm always by myself.
You won't commit; you want to be on your own.
Maybe it's time to leave you to yourself.

You might say I'm faceless, no one knows of me.
You never bring me around.
When you talk you're saying "I" instead of "we".
It kind of makes me feel really down.

Never felt so alone, so alone.
I'm always by myself.
You won't commit; you want to be on your own.
Maybe it's time to leave you to yourself.

Have I been stupid all along?
We only fought when we were together.
I should have known it would never last that long,
that you would blow me away just like a feather.
                                                        


Never felt so alone, so alone.
I'm always by myself.
You won't commit; you want to be on your own.
Maybe it's time to leave you to yourself.




शुक्रवार, 27 जून 2014

Self-Freedom

सम्पूर्ण स्वतंत्रता

क्या आप तनाब में रहते हैं? क्या आप अपने भविष्य के बारे में इतना सोचते हैं कि अपने बर्तमान का आनन्द भी नहीं ले पाते ? तनाब का सबसे बड़ा कारण जो हमारे पास है उसका आनंद न ले कर जो नहीं है उसके बारे में सोचते रहना व उन लोगो से तुलना करना जिनके पास है।  हमेशा याद रखें की खुश रहना एक सोच है धन दौलत और दुनियावी पदार्थो से मन की  शांति नहीं मिलती।  अकेले बैठ कर सोचें की जो विचार आ रहे हैं बह मन को शांत कर रहे हैं या अशांत कर रहे हैं। 

दुनिया में सबसे बड़ा दुःख का कारण राग और द्वैष है।  दुनिया बैसी जैसे हम ने मन में अपने ज्ञान और बुद्धि से  बनाई है।

क्या आप बार बार अपने भूतकाल यानि बीते हुए समय के बारे में सोचते हैं ? नकारत्मक या सकारत्मक।

सकारत्मक में पुरानी खूबसूरत यादेँ  जैसे आपकी उपल्बधियों की यादें या कहानिंयाँ , आपके रंगीन और हसीन तजुर्बे।  आपके साहसिक कारनामे  आदि।

नकारत्मक  में अपराध बोध (guilt )अहम (pride ) आक्रोष , क्रोध, पश्चात्ताप या आत्म दया आदि।

यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप केवल अपने झूठे भूतकाल को ही अपनी सोच में बार बार बैठा रहे हो बल्कि अपने बुढ़ापे को भी समय से पूर्व दस्तक दे रहे हो।

यदि इसको जाँचना चाहते हैं तो अपने इर्द गिर्द किसी को देखें जो इस तरह से भूतकाल में डूबा रहता है।

दुनिया खुश लोगों से मिलना पसंद करती है।  इसका प्रमाण T.V पर कॉमेडी सीरियल को देखें।  बहां देखने बालों की संख्या अधिक होती है।

कुछ लोग जो तनाब ग्रस्त रहते हैं उनका कारण एक और भी है।  वह हमेशा सोचते रहते हैं की बह लाइलाज वीमारी से ग्रस्त हैँ।  एक बार डॉक्टर से चेक उप करवा कर उसी प्रेस्क्रिशन पर कई कई साल दूकान बालों से बही पर्ची दिखा कर दवाई कहते रहते हैं।  जैसे पोदे को यदि अधिक पानी डाल दिया जाये तो पोदा सड़ जाता है कुछ इसी तरह से बिना डॉक्टर की सलाह से ली दवाई करती है।


क्या आप भूतकाल के बहुत से पल पल डर के मर रहे हैं?

आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं है।  केवल उसी समय भूतकाल को सन्दर्व मे ले जब इसकी जरूरत है।

पल में जीने की शक्ति को बढ़ावा दीजिये।  भूतकाल या भबिष्य काल के बारे में न सोचें।  पल बर्बाद तो बभिष्य बरबाद खुशियाँ बरवाद।

बर्तमान के पल में अपनी सम्पूर्ण स्वतंत्रता का आनंद लें। 

क्या आप चिन्तित रहते हैं? हमेशा if what के विचार आते रहते हैँ ? अपने आप को इनसे ऊपर उभारे। आप कर सकते हैं यह संभव है मैंने किया हैं।  मैं अब खुश हूँ। . अब ऐसा लगता है जिअसे भूतकाल एक सपना था सब बीमारीआं सपना थी  10 -15 साल का एक समय ऐसा लगताथा जैसे अब जीवन समापत  हो गया है।  परन्तु अपने देव में  विश्वास के सहारे आज लगता है जैसे वह एक सपना था और अव अनंत जीवन खुशीआं ही खुशीआं हैं। में आशावादी हूँ।

आपकी पहचान आपके मन से है। जो भूतकाल या भविष्य की कल्पनाओं में खोया रहने में मग्न रहना पसन्द करता है।

आप इस तरह की सिथति से मुकाबला कभी नहीं कर सकते क्यूंकि यह यथार्थ तो है नहीं केवल कल्पना है अपने मन से बनाया हुआ भूत है।  तो इसका इलाज़ कहाँ होगा।  केवल आप ही खुद इसका इलाज़ कर सकते है।  आप का सकते हैं।  आप अपने विचारों के मालिक हैं।  नकारत्मक िचारों।  को सकारत्मक बना सकते है। All is well . सभ कुछ ठीक है  का 108 बार दोहराने से मन में शांति भरे सकूँ भरे विचार आने शुरू हो जाते हैं।  शरीर ठीक होना शुरू हो जाता हैं।  21 दिन में बहुत अन्तर आ जाता है।  कर के स्वय महसूस करें।  नकारत्मक लोगो से बात न करें।  केवल चुपचाप करें।


अपने साँसों के बारे में सतर्कता बरतें।  सांस शरीर को ऊर्जा देते हैं जैसे पेट्रोल स्कूटर , कार आदि को ऊर्जा देता है।  साँसों को धीता गहरा लें और ऑंखें बंद कर के शरीर में रहने दें केवल सांस पर ध्यान दें और महसूस करें की शरीर में सांस कहाँ कहाँ जा रहा है।  मुख से अन्दर शरीर के ले जाएँ आँखें बंद रखें 2 से 5 मिनट तक सांस शरीर में रखें फिर नाक की तरफ से छोड़ दें।  बहुत हल्का महसूस होगा।  कुछ दिन करने से आप महसूस करेंगे की आपका क्रोध करना और स्वाभिक चिड़चिडा पन  कम  हो गया है।







 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

Fun


In youth,  I loved to excel and  run

I shun the fun
And always run and run.

As the speed was increasing,
The true life was decreasing.

The more I run, the more I shun my fun

The family and friends missed me.
Whenever I appeared once in a year,
Mom hugged me and kissed me.

As I advanced in life
I felt what for is all this stress and fuss,

All the day and night I run
And no time for fun.

As I grew wise with age
I wished to enjoy my fun
But alas youthful energy I lacked for fun,

From the window of my room,
I see the young kids play and make fun

Then I remember the days when I could have fun.
But kept on the run.

Nature turned the energy into wisdom;
I got to stop my run and taste the freedom.

From the window of my room, I look outside
And see small kids, singing, dancing and playing.
Now, small kids, their dance, their songs
 are the source of my fun.

Taught in youth, work hard and fun was bad,
I fled from fun

With the age, I stumbled on the truth,
The fun is not for the old but for the youth.











गुरुवार, 19 जनवरी 2012

Freedom



Those who 

deny freedom to others, 


deserve it not for themselves.


-         Abraham Lincoln


शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

FREEDOM




One cannot enjoy freedom himself

when he denies it to others.

Sharing of freedom among fellow beings

 gives the greatest of happiness.





“He who builds walls to create exclusion for others,

builds walls across his own freedom.

He who distrusts freedom on others

 loses his moral right to it.”

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

FAVOUR





To seek a favour is to barter away

one’s own  freedom.

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

FREE MAN





The truly free man is the one who will turn down

an invitation to dinner without giving an excuse.
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