पढ़ाई /काबलियत
बिज़नेस मैन का बेटा बिज़नेस मैन बन सकता है पढ़े या न पड़े।
परन्तु एक टीचर का बेटा बिना पढ़े लिखे सीधे टीचर नहीं बन सकता।
पढ़ाई और काबलियत केवल स्वयं लग्न और कोशिश से आती है।
स्व सुधार:
संस्कार बढ़े हैं या शिक्षा :
भिक्षु ने अपने गुरु से पूछा।
गुरु जी बोले: संस्कार
तो गुरु जी शिक्षा क्यूँ?
ताकि संस्कारों का मूल्य और शक्ति बढ़ सके।
उधाहरण से समझाता हूँ
1
एक बच्चा है केवल 10बी तक पढ़ा लिखा और अपने पिता के साथ खेती करने लगा। माता पिता का सम्मान करता है, भाषा मीठी है, माता पिता की आज्ञा पालन करता है।
समाज मे सभी के काम आता है। जितना हो सकता है, समर्था अनुसार सहायता करता है
गांब के बच्चों को पढ़ाता और गाइड भी करता है।
बहुत से बच्चे उससे बेसिक गाइडेंस ले कर बढ़े बढ़े पदों पर लग गए।
☺️
अब इसी का दूसरा भाई है।
पहले गांव में पढ़ा। फिर मां बाप ने कर्ज लेकर पढ़ाया लिखाया।
शहर में पढ़ा , शादी हुई पढ़ी लिखी लड़की से।
यह हर चीज यानी पिता का संघर्ष, माँ और भाई के त्याग को पैसों में तोलता है।
अब रेटिरेमैंट के बाद गांब में रहने के लिये आया।
परन्तु स्वार्थी स्वभाव के कारण, गांब में दुःखी हो गया, शहर में रहने के लिये मजबूर।
अकेले पति पत्नी।
बच्चे दूसरे देशोँ में।
स्वार्थी स्वभाव और अहँकार के कारण कोई सहायता भी नहीँ करता, न ही बोलता बुलाता है। नतीजा अकेला पन।
अब सोचो पहला अच्छा है या दूसरा?
पहले के पास संस्कार हैं
दूसरे के पास शिक्षा
संस्कारों से शिक्षा का मोल।कई गुना बढ़ जाता है।
संस्कार क्या है,,?
1
- जन्म देने बालों की इज़्ज़त करना
2
- ऐसा कोई ब्यवहार या कर्म न करना जिससे उनका मन दुःखी हो।
3
- ,स्कूल।में टिफ़िन शेयर करना संस्कार वासुदेवाय कुटुंबकम की भावना देता है।
4
,-सहायता देना और सहायता मांगना भी एक अच्छा संस्कार है कियूंकि No man is an island.
जीवन की 3 stages हैं,:
* Dependence(निर्भरता) बच्चा पैदा होता है, माता पिता, आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक सभी तरह का सहारा देते हैं।
**Independence (स्वतंत्रता,) बच्चा पड़ता है लिखता है स्वतंत्र हो जाता है, निर्भर से आत्मनिर्भर हो जाता है।।परन्तु 10-15 साल में फिर अहसास होता है जीवन निर्भर और आत्मनिर्भर से ऊपर है।
*** Inter -dependence इस स्टेज पर स्वार्थ नम्रता और शेयरिंग में बदल जाता है, समाज क़े लिये कुछ करने को मन करता है। अपनी तरक्की की बजाए दुसरों की खुशी अच्छी लगती है।
जरूरी नहीं के सभी तीसरी स्टेज पर पहुंचे। अधिकतर 2 stages तक संतुष्ट रहते हैँ।
इसलिये संस्कार शिक्षा से अधिक खुशी देने का साधन हैं।
संस्कार स्वयं बिना सिखाये सीखने पढ़ते हैं जबकि शिक्षा सिखाई जाती है। परन्तु जीवन यापन शिक्षा से होता है।
केवल संस्कार: खुशी का स्तर 50 %
केवल शिक्षा: खुशी का स्तर 50%
संस्कार + शिक्षा= खुशी का स्तर 100%
5
- करुणा , दुसरों से, प्रेमपूर्वक व्यवहार, व्यावहारिक नम्रता, आस्था, बिश्वास- स्वयं और दूसरों पर, संशय संहार, बीरता, शौर्य, गंभीरता, बड़ों का सम्मान, संतुष्टि भरा जीवन, अंध विश्वास न करना, जिओ और जीने दो की भावना रखना , देश प्रेम आदि संस्कार इंसान को साधारण मनुष्य से असाधारण बनाते है
अपनाएं और देखेँ शिक्षा कैसे सफलता में बदलती है।
शुरू में ज्ञान प्रचार नाम के पीछे डिग्रियां लगा कर होता है, फिर असली ज्ञान अनुभव से बढ़ जाता है औऱ डिग्रियां दिखाबा बंद और जो सीखा है उसकी शेयरिंग शुरू।
संस्कार हर पल हर जगह काम आते हैं, घर पर, सड़क पर, किसी से मिलने पर, शिक्षा केवल जहाँ जरूरत होती बहिं काम आती है। जैसे टीचर की शिक्षा स्कूल में, ऑफिसर की शिक्षा आफिस में।
बाकी जगह तो संस्कार चाहिए।
हम बात करते हैं, बात कहने के भी अलग अलग तरीके होते, अलग अलग लहज़ा होता है, अलग अलग अलग हाव भाव होते हैं , अलग अलग उच्चारण होते हैं, सहजता, धीरे से बोली बात कानों को मिठास देती है, दिलों को जोड़ती है, जबकि ऊँची आवाज़ में की गई, सहज और मीठी बात भी कड़वी लगती है, ईर्ष्या को बढ़ावा देती ह।।
संस्कार पर्सनलिटी के लिये बैसे ही है
जैसे
फूल की खुशबू,
दूध की सफेदी,
गन्ने की मिठास।
सोचें और स्वभाव सुधारे।
B 1331