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रविवार, 12 नवंबर 2017

Parent Institute

ਸਾਡੀ ਪੈਰੇਂਟ ਇੰਸਟੀਟਿਊਟ   

 ਪਰਾਗ ਮਾਈਂਡ ਪਾਵਰ ਸਪੋਕਨ ਇੰਗਲਿਸ਼ ਇੰਸਟੀਟਿਊਟ    ਹੈ। 
ਐਡਰੈੱਸ : ਗਰੇਵਾਲ ਕੰਪਲੈਕਸ , ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਕਾਲੋਨੀ , ਗਿੱਲ ਕੈਨਾਲ ਰੋਡ , ਨੇੜੇ ਬੰਦ ਧੁਰਿ ਫਾਟਕ , ਲੁਧਿਆਣਾ। 

ਫੋਨ : 098720 00716 ਜਾਂ 09463380909 .

ਕਿਵੇਂ ਪਹੁੰਚੀਏ :

1) ਜੀ ਐਨ ਈ ਵਲੋਂ : ਬੱਸ ਸਟੈਂਡ ਜਾਂ ਸਟੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ਗਿੱਲ ਨਹਿਰ ਤੇ ਉੱਤਰੋ , ਦੁਗਰੀ ਪੁਲ ਬਾਲੀ ਤਰਫ ਨਹਿਰ ਦੇ ਕਿਨਾਰੇ 3 ਮਿੰਟ ਪੈਦਲ ਚਲੋ।  ਪੁਲ ਤੇ ਛੱਡੋ ਨ।  ਧੁਰਿ ਫਾਟਕ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾ ਗਰੇਵਾਲ ਕੰਪਲੈਕਸ ਵਿਚ ਇਹ ਇੰਸਟੀਟਿਊਟ ਹੈ।  ਕੋਰਸ 8 ਹਫਤਿਆਂ ਦੇ ਹਨ।  ਕੋਈ ਭੀ ਜਿਸ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਬੋਰਡ ਦੀ ਦਸਵੀਂ ਪਾਸ ਕੀਤੀ ਹੈ ਇਹ ਕੋਰਸ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ।   ਸਟੇਸ਼ਨ ਜਾਨ ਬੱਸ ਸਟੈਂਡ ਤੋਂ ਥ੍ਰੀ ਵ੍ਹੀਲਰ ਦਾ ਕਿਰਾਇਆ 10 ਰੁਪਏ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। 

2) ਦੁਗਰੀ ਵਲੋਂ : ਬੱਸ ਸਟੈਂਡ ਤੋਂ ਥ੍ਰੀ ਵ੍ਹੀਲਰ ਲਬੋ 10 ਰੁਪਏ ਲੱਗਦੇ ਹੁਣ।  ਦੁਗਰੀ ਪੁਲ ਤੇ ਉੱਤਰੋ।  ਨਹਿਰ ਦੇ ਕੰਡੇ ਕੰਡੇ ਪੁਲ ਦੇ ਥੱਲੇ 2 ਮਿੰਟ ਚਲੋ ਜੀ ਐਨ ਈ ਕਾਲਿਜ ਬਲ ਨੂੰ। ਧੁਰਿ ਲਾਇਨ ਪਾਰ ਕਰਕੇ ਗਰੇਵਾਲ ਕੰਪਲੈਕਸ ਹੈ।  ਉਥੇ ਇੰਸਟੀਟਿਊਟ ਹੈ। 


ਹੋਰ ਜਾਣਕਾਰੀ ਲਈ ਪੜੋ :
Facebook Page : Prag Mind Power Spoken English Institute

8 ਹਫਤੇ ਦੇ ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ  ਕੋਰਸ  ਹਨ  :

8 weeks Certificate Skill and Personality Development Courses.

1) Spoken English & Effective Communication (How to speak  and write simple ,correct and powerful English )

2) IELTS /TOEFL /TOIEC  ਟ੍ਰੇਨਿੰਗ

3) Business English (English is the language of modern business. Email writing, report writing, business communication skills etc.)

4) English for Banking Examinations (Clerks and P.O)

5)English Grammar for Schools/Colleges  
Level   1:        9th, 10th, +1 and +2              ਸਮਾਂ 3 ਤੋਂ 4.10 ਪਮ 
Level   2:        Diploma/Degree B.A/M.A/MBA/MCA/Ph.D

100% ਗਰੰਟੀ ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਮਨ ਲੈ ਕੇ ਕਲਾਸਾਂ ਲਯੋ ਤੇ ਪੜੋ। 

ਇਹ ਇੰਸਟੀਟਿਊਟ ਸਿਰਫ ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਜੋ ਆਪਣੇ ਬਵਿਖ ਵਿਚ ਕੁਝ ਬਣਨਾ ਚਾਹੰਦੇ ਹਨ। 

 ਕੋਈ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਪੜਾ  ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ।  ਪਰ ਹਰ ਕੋਈ ਜਿਨਾਂ ਚਾਹੇ ਪੜ ਸਕਦਾ ਹੈ।  ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਹਿਬ ਨੇ 53 ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਵਿਚ MBA ਕੀਤੀ ਹੁਣ 60 ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਵਿਚ Google ਅਮਰੀਕਾ ਤੋਂ Digital Marketing ਦਾ ਕੋਰਸ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਹਿਬ ਪਿਛਲੇ 9 ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਗੂਗਲ ਲਈ ਲਿਖਦੇ ਹਨ

 ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਜਦ ਤਕ ਜੀਵਨ ਤਦ ਤਕ ਗਿਆਨ  ਹਾਸਿਲ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।  ਇਕ ਪੜਾਈ ਹੀ ਆਪਣੀ ਹੈ ਬਾਕੀ ਸਬ ਕੁਛ ਦੂਜੇ ਲੈ ਸਕਦੇ ਹਨ।  ਪੜਾਈ ਨਹੀਂ।  50 ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਤੋਂ ਬਾਦ ਪੜਾਈ ਹੀ ਕਮ ਆਂਦੀ ਹੈ ਹੋਰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ। 

ਪੜੇ ਲਿੱਖੇ ਇਨਸਾਨ ਦੀ ਸਾਰੀ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਵਾਹ ਵਾਹ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।  

ਕਲਾਸ : 
ਸੋਮਬਾਰ ਤੋਂ ਸ਼ੁਕਰਬਾਰ ਹਫਤੇ ਵਿਚ ਪੰਜ ਦਿਨ।  1 ਘੰਟਾ ਪੜਾਈ 10 ਮਿਨਟ ਜੋ ਸਿਖਿਆ ਹੈ ਉਸ ਤੇ।   ਡਿਸਕਸ਼ਨ 

ਕੰਮ ਕਾਜ ਕਾਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਲਈ ਕਲਾਸ ਸਿਰਫ ਏਤਬਾਰ ਲੱਗਿਆ ਕਾਰਨ ਗਈਆਂ।  ਕੋਰਸ 2018 ਵਿਚ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੇ ਜਾਣਗੇ।  ਕਿਉਂਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਬੋਲਣਾ ਲਿਖਣਾ ਅੱਜ ਦੇ ਯੁਗ ਦੀ ਸਬਤੋਂ ਬੜੀ ਜਰੂਰਤ ਹੈ।  

ਇਕ ਨੋਟ : ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ  ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਪੰਜਾਬੀ ਦੇ  ਪੇਪਰ ਪਾਸ ਨਹੀਂ ਕੀਤੇ ਹੋਏ।  ਗੂਗਲ ਟੂਲ ਲਾ ਕੇ ਪੰਜਾਬੀ ਲਿਖਦੇ ਹਨ।  ਪੜੋ ਤੇ ਸਮਝੋ।  ਸਪੈਲਿੰਗ ਨ ਚੈਕ ਕਰੋ ਯਾ ਗਲਤੀਆਂ ਵਲ ਧਿਆਨ ਨ ਦਵੋਜੀ।  









जीवन दाता पत्र

जीवन दाता पत्र

1 यह विवरण एक मेंटोर ने एक सेमिनार में दिया।  परन्तु इस विवरण से सभी 100 से अधिक श्रोताओं को लाभ हुआ।  आप पड़  रहें हैं इस लिए आप को भी इससे बहुत लाभ होगा।  जीवन में कुछ छोटी छोटी घटनाएं अज्ञानता के कारण बड़ी बड़ी समस्याएं पैदा कर देती हैं।

2 सुविधा के लिए हम पात्रों के काल्पनिक नाम  रखते हैं।  :

-       शुभेन्दु (पिता)

-      सुमन (बहु)

-      सुलभ (सपुत्र )

-      अगम्य (शुवेन्दु की पत्नी )

3 शुभेन्दु की पत्नी अगम्य एक सुशिल और संस्कारी ग्रहणी थी।  दोनों ने जीवन भर अपने तीन बच्चों - दो बेटियों और बेटे सुलभ को पढ़ाया, लिखाया और अच्छे संस्कार दिए।  शुभेंदु  दिन भर खेतों में काम करता।  दिन ढलने के बाद थक कर घर आता और हाथ मुंह धो कर खाने का इंतज़ार करने लगता।  अगम्य बड़ी लगन और चाब से खाना बनाती।

4 जिस समय बह रसोई मे खाना बनाती तो हमेशा प्रभु के भजन का गुणगान करती।  जब भी उससे पूछा की ऐसा क्यों ?

 उसका एक ही उत्तर होता :             

प्रभु का सिमरन करने से खाने में सतगुण आ जाते हैं जिससे खाना खाने बाले इंसानों में भी सतोगुण परिवृति का आगाज़ होता है।

जब खाना पक जाता , सभी परिवार के सदस्य एक बिछोना बिछा कर उस पर बैठ जाते।  यह समय सभी के लिए ख़ुशी का समय होता।  पिता सबसे आगे, उसके बाद बच्चे।

कई बार बच्चे हाथ मुहं धो कर न बैठते तो अगम्य डांट कर उनेह हाथ धोने के लिए कहती।  इस समय दूसरे बच्चे जिस बच्चे को डांट  पड़ती को देख कर दांत निकलते और चिढ़ाते।

पिता मुस्कराता था।  मन ही मन प्रभु का धन्यवाद भी करता की उसका परिवार खुशहाल है।

5 समय बदलता है।  यह किसी के बश में नहीं है।  कोई भी इसे बदलने से रोक नहीं सकता।

जीवन के कुछ दिन, कुछ महीने बुरे हो सकते है पूर्ण जीवन कभी भी बुरा नहीं होता।

 बुरा तभी होता है जब इंसान अपने कर्म और सोच बुरी कर लेता है।  अच्छी किताबें देव प्रतिमाओं की तरह है।  जिनेह पड़ने से दिमाग खुलता है।  उत्कृष्ट भाव से लिखी किताबें पड़ने बाले को उत्कृष्ट बना देती हैं।  और नकारत्मक सोच से लिखी किताबें पड़ने बाले को निष्कृष्ट बना देती है।  चॉइस आपकी अपनी है।  आप क्या पड़ते हो , क्या देखते हो इसका जीवन पर बहुत प्रभाब पड़ता है।

6 हाँ तो समय बदलने लगा।  अगम्य की आकस्मिक मृत्यु हो गई।  बेटियों की शादी हो गयी। बेटीआं दिन त्यौहार पर आती और चली जाती।  जब तक बेटीआं और नाती (उनके बच्चे ) रहते शिवेंदु बहुत खुश रहता।  उसके बाद उस पर उदासी छा जाती।  सभी पिता की तरह शिवेंदु भी अपनी बेटिओं से बहुत प्यार करता था।  लेकिन उसे ज्ञान था बेटियन पराया धन है। 

 बेटे सुलभ की शादी सुमन से हो गई।  .शेवेन्दु अकेला पड़ गया।  हमेशा घर के बाहर पेड़ के नीचे अपनी चारपाई लगा कर चुपचाप लेटा रहता।  सुमन अपने ससुर की बहुत सेवा करती परन्तु फिर भी शेवेन्दु का स्वास्थ्य दिन ओ दिन गिरता ही जाता।  किसी को समझ न आता की क्या कारण है।  सपुत्र सुलभ बहुत ही चिंतित रहता।  अपने काम पर जा कर भी दिन भर अपने पिता के बारे में सोचता रहता।
What is life?

A journey from B to D. In between is C.

B=Birth, D=Death, C=Choice. Choice right, enjoy rail.

Choice wrong: Heal your heels inside the jail.

Choice lies with you whether you want to enjoy rail or rest in jail.

7 सुलभ की पत्नी अपने ससुर की इतनी चिंता क्यों करती थी।  यह भी एक घटना के कारण हुआ।  सुमन की नई नयी शादी हुई  थी।

परन्तु ससुराल में दो ननदें देख कर , बड़ा परिवार देख कर उसका व्यवहार अजीव हो गया।  उसने अपने पति से कहना शुरू कर दिया की बह तो अकेले घर में रहेगी।

सुलभ को यह सब सुन कर और जान कर बहुत ही दुःख हुआ।

उसका मन में अंतर्द्विन्द चलता रहता :          माता पिता को छोड़ता हूँ तो पाप लगता है क्यूंकि बही तो मेरे दृश्या   भगवन है।

 उन्हों ने जन्म दिया , उन्हों पढ़ाया लिखाया। अब बुढ़ापे में उनकी सेवा करना  मेरा धर्म है।
 यदि बह मेरा लालन पालन  न करते तो जो मैं आज हूँ क्या होता ?

 दूसरा विचार आता : पत्नी गर्भवती है उसे छोड़ता हूँ तो परिवार नष्ट होता है।  बिना परिवार जीवन क्या है ?

इसी अंतर्द्विन्द में उसने दुखी हो कर आत्म हत्या करने की सोची।

 परन्तु इससे  पहले उसे एक बजुर्ग ने सलाह दी की तू जा कर अपने माता पिता को अपनी समस्या बतादे।  बे तुम्हारी समस्या का हल कर देंगे।  हिम्मत करो।

8 सुलभ ने हिम्मत की और अपने माता पिता को अपनी समस्या बताई।  माता पिता ने कहा ये तो बहुत छोटी बात है।  जो बात सुलभ को बहुत ही बड़ी लग रही थी बह माता पिता को बहुत छोटी लगी।  सुलभ बहुत हैरान था। माँ बोली: हमने अपनी काट ली है तुम अपनी ख़ुशी से काटो।

 अपनी पत्नी को लेकर किसी किराये के मकान में रह लो।  सुलभः बहुत खुश था की उसकी समस्या का हल हो गया है।  पत्नी भी झट से मान गई।  सुलभ और सुमन के घर बेटे का जन्म हुआ।  सुमन ने अपनी माँ को बुलाया।  जरूरत होती है इन दिनों में।  उसकी सास अगम्य अपने पोते के बारे में सुन कर रह न सकी और हिम्मत करके आ गई बेटे के घर।  बहां पर दोनों समधने इकठी रही।

9 दो तीन दिन रहने के बाद सुलभ की सास यानि सुमन की माँ बोली : अच्छा बेटी तुम्हारी सास आ गई है अब मैं चलती हूँ घर भी देखना है।      सुमन बहुत गिड़गिड़ायी परन्तु उसकी माँ ने अपना सामान बांधा और चली गई।  अब सुमन की सास 40 दिन के बाद अपने घर जाने लगी तो सुमन ने उसके पायों पकड़ लिए और कहा : मां तुम ही मेरी मां हो , मेरी मां तो 3 दिन बाद चली गई।  रुको मैं भी अपना सामान बांधती हूँ और आपके साथ  अपने घर चलती हूँ।  माँ चुप।  बहु ने सामान बाँधा और अगम्य , सुलभ, सुमन और उनका नवजात शिशु तीनो अपने गाँब के घर लौट आये।

10 यही एक कारण था कि सुमन अपने ससुर का बहुत सामान करती थी।  उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती थी।  क्यूंकि बह जान चुकी थी कि मेरा घर मेरा ससुराल है मायका नहीं।

11 अब शिवेंदु की बीमारी।  सुलभ को एक दिन एक ज्ञान बान सीनियर सिटीजन यानि बजुर्ग मिले।  उसने अपनी ब्यथा उसे सुनाई।  सुलभ ने कहा : मेरे पिता ही को पता नहीं क्या बीमारी लग गई है ? सुबह से शाम तक घर के प्राँगण में लेटे रहते है।  न किसी कुछ कहते हैं न कहीं आते जाते है।  बहुत डॉक्टरों को दिखाया है।  2 -3 लाख रूपए भी खर्च हुए है परन्तु लाभ कोई नहीं।  बुद्धिमान बजुर्ग ने कहा : एक उपाए है।  यह सुनते ही सुलभ की आँखों में चमक आ गई।  बोला : क्या है ? कृपया बताएं।

12 क्या आप अपने पिता को कोई पैसा देते है जो उनका ही हो कोई हिसाब न मांगे।  सुलभ ने कहा:  नहीं।
"तो आज जा कर 2000 रूपए अपने पिता को देना और उनके कान में कहना : पापा यह पैसे आपके हैं जो मर्जी करो इनका।  खायो पियो।  किसी को कोई हिसाब नहीं मांगेगा। "

सुलभ ने एक पत्र लिखा और अपने पिता से पड़ने को कहा जिस पर जो ज्ञानबान बजुर्ग ने कहा था लिखा था और इसके प्रभाब ने सुलभ को अचम्बा कर दिया। जो बह 2 -3 लाख रूपए लगा कर न कर पाया बह इस 2000 रूपए ने कर दिखाया।

पिता उठा और नहाया धोया और सफ़ेद रंग का साफ़ सुथरा कमीज पजामा पहना।

पगड़ी बाँधी।  पायों मे मौजे पहने।  दो घंटे के बाद अपने दोस्तों से मिल कर तारो ताज़ा अपने घर बापिस लोटा।  पोते से आज बड़ा हंस हंस कर दादा बातें कर रहा था।

 सुलभ और सुमन भी बहुत खुश थे की उनके पिता की बीमारी समाप्त हो गई है।

13  दूसरे दिन सुलभ ने सीनियर सिटीजन से यह सब बताया और पूछा कि यह सब कैसे हुआ।

 बजुर्ग ने बताया : बेटे जब बाप बजुर्ग हो जाता है तो उसे भी पैसे की जरूरत होती है परन्तु युवा बहु बेटे उसे यदि 100 रूपए दें तो उसका भी हिसाब मांगते हैं जिससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है।  इसका इलाज दुनिया के किसी डॉक्टर के पास नहीं है।

  बहु और बेटे को अपने अपने माता पिता का शब्दों से सम्मान करना चाहिए और उनकी जरूरत के मुताबिक धन देना चाहिए।  अपशब्द या ऊँची टोन में बात नहीं करनी चाहिए।  मां बाप नहीं तो जन्म नहीं , जन्म नहीं तो दुनिया नहीं।  सुलभ ने उस बुद्धिमान इंसान का धन्यबाद किया।