बैल व्यव्हार
बहुत दिनों से मेरे मुहल्ले के बच्चे मुझसे कुछ कहने के लिए कह रहे थे और मैं अपनी व्यस्तता के कारण उनको किसी न किसी बहाने से टाल रहा था। परन्तु कल उन्हों ने हठ किया और अपने मन की बात कह दी।
बच्चे : अंकल हमारे मम्मी पापा, चाचा - चाची, ताया- ताई और सभी बड़े हम पर विश्वास नहीं करते।
मैं बोला : बच्चो , यह आप को कब और कैसे जानकारी हुई ?
बच्चे : जब भी हम लोग बाहर जाते हैं हमारे बड़े हमारे से सौ सवाल पूछते हैं। कहाँ गए थे ? बता कर क्यों नहीं गए ? जाने से पहले बड़ों को बताना फ़र्ज़ नहीं है? तुम्हारा फोन भी बंद था ? आज जमाना कैसा है तुम्हे पता
है ? ऐसे सब प्रशन हमें बहुत परेशान करते हैं ? हम सम्पूर्ण मन से अपने दोस्तों से मिल भी नहीं सकते। समय की पाबंदी। हम बहुत परेशान हैं। आप बड़े हैं हमें इस समस्या का हल बताएं।
मैं मुस्कराया।
बच्चे और हैरान ब परेशान कि अंकल मुस्करा कियूं रहे हैं ?
अन्त में बच्चों ने पूछ ही लिया : अंकल आप हंस क्यों रहे हैं?
बचो मुझे अपने विद्यार्थी काल की एक घटना यानी कहानी याद आ गई है ?- मैंने उत्तर दिया।
कहानी का नाम सुनते ही बच्चे अपनी परेशानी भूल गए और मुझ पर कहानी सुनाने के लिए जोर डालने लगे।
हाँ तो आप की परेशानी क्या थी? मैंने पुछा।
नहीं परेशानी बाद में , पहले कहानी बच्चे
बच्चों की इस उत्सुकता को देखते हुए मैंने कहा : अच्छा तो सुनो कहानी।
सभी बच्चे अनुशासित हो कर कुर्सियों पर बैठ गए। कुछ छोटे बच्चे शरारतें कर रहे थे। उनको बड़े बच्चों ने फटकार लगा चुप होकर बैठने को कहा।
तो बच्चो सुनो। बात उन दिनों की है जब आप के अंकल यूनिवर्सिटी में पड़ा करते थे।
छोटे बचे हसने लगे: हा हा हा एंकल भी पढ़ते थे। मार पड़ती थी ? हाँ पड़ती थी।
सभी बच्चे बड़े जोर से हँसे।
कहानी शुरू : जब हम बच्चे थे तो हमे भी अच्छा नहीं लगता था कि हमारे माँ बाप या बड़े बजुर्ग हमसे आने जाने के बारे में क्यों पूछते हैँ ?
हम बच्चों ने अपने प्रोफेसर से यह बात की और हमारे प्रोफेसर ने यह कहानी सुनाई ? सुनायुं ?
सुनायो न अंकल !
तो सुनो।
एक गरीब किसान था। बह और उसकी पत्नी दोनों खुद अपना हल जोत कर अपनी जमीन की बोयाई करते क्यूंकि बैल तो उनके पास थे नहीं।
इतने गरीब थे ? बच्चों ने पूछा।
हाँ बहुत गरीब थे।
किसी द्याबान किसान ने उनको एक बछड़ा दान में दे दिया। इस किसान ने प्यार से इस बछड़े का नाम "दिनू" रख दिया। बछड़ा बड़ा हो होता गया।
कुछ दिनों के बाद किसी और गाँब के दानी किसान ने इस किसान को एक बछड़ा (गाय या भैंस का बच्चा ) दे दिया।
किसान और उसका परिवार बहुत खुश था कि अब उनके पास दो बछड़े हैं। जब यह बछड़े बड़े होंगे तो उनको हल ख़ुद नहीं जोतना पड़ेगा बल्कि यह बैल उनके जीवन का पालन पोषण करेंगे और जीवन आसान हो जायेगा।
इस नए बछड़े को प्यार से "दिवेश " पुकारने लगे।
बच्चे बड़ी उत्सुकता से सुन रहे थे।
बछड़े खेलते कूदते चारा खाते पानी पीते सभी को अच्छे लगते। कई बार तो बछड़े कपड़े तक खा जाते। जब बीमार होते तो किसान दूर के हस्पताल से पशुओं के डॉक्टर को बुलाता और बच्छड़ों का इलाज़ ब दवाई करवाता। जब बछड़े बीमार होते या उनको चोट लगती तो घर के सभी छोटे बड़े बड़े चिन्तित रहते। जब तक कि बछड़े ठीक नहीं हो जाते। जब बछड़े पूर्ण रूप से चारा खाने लगते तभी किसान ब उसके परिवार बाले मन से खाना खाने लगते।
आहिस्ता आहिस्ता बछड़े बड़े हो गए समय बैल बन गए।
किसान बहुत खुश था कि उसके पास दो बैल हैं। गाँब के लोग भी बातें करते कि किसान के दिन अब अच्छे आ रहे हैँ। अब किसान खुश रहा करेगा।
किसान ने दो घंटों खरीदी और बैलों के गले में बांद दी।
घण्टियों की आबाज से ही किसान की पत्नी को पता चल जाता कि बैल जंगल से चार कर आ गए हैं।
एक दिन किसान ने सोचा कि अब समय आ गया है कि बैलों को हल से जोता जाए।
अँकल बैल को कैसे जोता जाता है ? एक छोटे से बच्चे ने पुछा।
बेटे हल खेत को जोतने बाली यंतिरिका होती है

किसान और उसकी पत्नी ने सभी तैयारों की और दोनों बैलों को खेत में ले जा कर एक नारियल फोड़ा
, प्रार्थना की और बैलों को हल से जोड़ा। परन्तु ये क्या "दीनू " तो चुपचाप शांति से हल से जुड़ा खड़ा है परन्तु "दिवेश " हल से जुड़ ही नहीं रहा और हल को तोड़ कर भागने की कोशिश कर रहा है।
किसान ने बहुत कोशिश की परन्तु सफलता न मिली। वह निराश हो गया। कई दिन यही सिलसिला चलता रहा परन्तु "दिवेश" जिम्मेबारी लेने को तैयार ही नहीं था।
एक दिन हार कर किसान ने "दिवेश " को खुला छोड़ दिया। "दिवेश" बहुत खुश था। जंगल में घूमता ,अपनी मर्जी की घास खाता, नदी से पानी पीता और अपनी मर्जी से खुले जंगल में सो जाता। आजादी ही आजादी। कोई रोक टॉक नहीं कोई जिम्मेबारी नहीं।
छः महीने बीत गए बड़े माझे से। एक दिन 'दिवेश " अपने पुरे मन से जंगल मैं भाग रहा था ताजा कि इसके सीँग एक झाड़ी ममें फंस गए। "दिवेश" ने बहुत कोशिश कि सीँग छूट जाए परन्तु सींग नहीं छूटे बल्कि एक सींग टूट गया। बहुत दर्द हुआ। बहुत खून बहा। "दिवेश" बहुत तड़फा। बहुत चिल्लाया। परन्तु जंगल में वह अकेला था इस लिए कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आया। किसान को भी पता न लगा। घाब से खून बहता रहा। थोड़े दिनों के बाद घाब में कीड़े पैदा हो गए।
आहिस्ता, आहिस्ता यह कीड़े सारे शरीर मैं फेल गए और "दिवेश " की असमय मौत हो गई।
अब "दीनू" की सुनो। "दीनू " सुबह ताजा हरा चारा खाता। किसान या उसकी पत्नी हर रोज़ उसकी मालिश करती। "दीनू" और किसान फिर खेत मैं चले जाते। किसान उसे बड़े प्यार से हल से जोतता और अपना खेत की बोयई करता। दोपहर को किसान अपना खाना खता तो 'दीनू" को भी पेड़ की छाया के नीचे बांड देता। हरा चारा डालता, पीने के लिए पानी डालता। संध्या समय "दीनू " ब "किसान दोनों घर आते। किसान का बीटा दीनू की मालिश करता और चारा डालता।
फिर "दीनू " आराम से सो जाता। जब "दीनू" बीमार होता किसान भाग कर साथ बाले गायों से डॉक्टर को लेकर आता और दवाई दारू करता। तब तक घर में ख़ुशी नहीं आती जब तक ":दीनू " ठीक नहीं हो जाता। "दीनू" था तो बैल परन्तु सभी उससे घर के सदस्य की तरह ही प्यार करते।
बच्चो जो बचे अपनी जिमेदारी को समझते हैं अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हैं वह जीवन मे सुख भोगते हैं और उनका जीवन भी लम्बा होता है।
आप "दीनू" बनोगे या "दिवेश"
अंकल "दीनू "
माता पिता किसान है हमारा बेलगाम आजाद गैर जिम्मेबार व्यवहार "दिवेश " जिम्मेबार व्यवहार अनुशाषित जीवन "दीनू " है।
अब बच्चों के माता पिता आते हैं और पूछते हैं की आप ने बच्चों को क्या कहा। बच्चे भी मुस्कराते हैं मैं भी। यह कहानी तो मुझे और बच्चों को पता है। परन्तु उनके व्यव्हार का बदलाब माता पिता को महसूस हो रहा है।
बहुत दिनों से मेरे मुहल्ले के बच्चे मुझसे कुछ कहने के लिए कह रहे थे और मैं अपनी व्यस्तता के कारण उनको किसी न किसी बहाने से टाल रहा था। परन्तु कल उन्हों ने हठ किया और अपने मन की बात कह दी।
बच्चे : अंकल हमारे मम्मी पापा, चाचा - चाची, ताया- ताई और सभी बड़े हम पर विश्वास नहीं करते।
मैं बोला : बच्चो , यह आप को कब और कैसे जानकारी हुई ?
बच्चे : जब भी हम लोग बाहर जाते हैं हमारे बड़े हमारे से सौ सवाल पूछते हैं। कहाँ गए थे ? बता कर क्यों नहीं गए ? जाने से पहले बड़ों को बताना फ़र्ज़ नहीं है? तुम्हारा फोन भी बंद था ? आज जमाना कैसा है तुम्हे पता
है ? ऐसे सब प्रशन हमें बहुत परेशान करते हैं ? हम सम्पूर्ण मन से अपने दोस्तों से मिल भी नहीं सकते। समय की पाबंदी। हम बहुत परेशान हैं। आप बड़े हैं हमें इस समस्या का हल बताएं।
मैं मुस्कराया।
बच्चे और हैरान ब परेशान कि अंकल मुस्करा कियूं रहे हैं ?
अन्त में बच्चों ने पूछ ही लिया : अंकल आप हंस क्यों रहे हैं?
बचो मुझे अपने विद्यार्थी काल की एक घटना यानी कहानी याद आ गई है ?- मैंने उत्तर दिया।
कहानी का नाम सुनते ही बच्चे अपनी परेशानी भूल गए और मुझ पर कहानी सुनाने के लिए जोर डालने लगे।
हाँ तो आप की परेशानी क्या थी? मैंने पुछा।
नहीं परेशानी बाद में , पहले कहानी बच्चे
बच्चों की इस उत्सुकता को देखते हुए मैंने कहा : अच्छा तो सुनो कहानी।
सभी बच्चे अनुशासित हो कर कुर्सियों पर बैठ गए। कुछ छोटे बच्चे शरारतें कर रहे थे। उनको बड़े बच्चों ने फटकार लगा चुप होकर बैठने को कहा।
तो बच्चो सुनो। बात उन दिनों की है जब आप के अंकल यूनिवर्सिटी में पड़ा करते थे।
छोटे बचे हसने लगे: हा हा हा एंकल भी पढ़ते थे। मार पड़ती थी ? हाँ पड़ती थी।
सभी बच्चे बड़े जोर से हँसे।
कहानी शुरू : जब हम बच्चे थे तो हमे भी अच्छा नहीं लगता था कि हमारे माँ बाप या बड़े बजुर्ग हमसे आने जाने के बारे में क्यों पूछते हैँ ?
हम बच्चों ने अपने प्रोफेसर से यह बात की और हमारे प्रोफेसर ने यह कहानी सुनाई ? सुनायुं ?
सुनायो न अंकल !
तो सुनो।
एक गरीब किसान था। बह और उसकी पत्नी दोनों खुद अपना हल जोत कर अपनी जमीन की बोयाई करते क्यूंकि बैल तो उनके पास थे नहीं।
इतने गरीब थे ? बच्चों ने पूछा।
हाँ बहुत गरीब थे।
किसी द्याबान किसान ने उनको एक बछड़ा दान में दे दिया। इस किसान ने प्यार से इस बछड़े का नाम "दिनू" रख दिया। बछड़ा बड़ा हो होता गया।
कुछ दिनों के बाद किसी और गाँब के दानी किसान ने इस किसान को एक बछड़ा (गाय या भैंस का बच्चा ) दे दिया।
किसान और उसका परिवार बहुत खुश था कि अब उनके पास दो बछड़े हैं। जब यह बछड़े बड़े होंगे तो उनको हल ख़ुद नहीं जोतना पड़ेगा बल्कि यह बैल उनके जीवन का पालन पोषण करेंगे और जीवन आसान हो जायेगा।
इस नए बछड़े को प्यार से "दिवेश " पुकारने लगे।
बच्चे बड़ी उत्सुकता से सुन रहे थे।
बछड़े खेलते कूदते चारा खाते पानी पीते सभी को अच्छे लगते। कई बार तो बछड़े कपड़े तक खा जाते। जब बीमार होते तो किसान दूर के हस्पताल से पशुओं के डॉक्टर को बुलाता और बच्छड़ों का इलाज़ ब दवाई करवाता। जब बछड़े बीमार होते या उनको चोट लगती तो घर के सभी छोटे बड़े बड़े चिन्तित रहते। जब तक कि बछड़े ठीक नहीं हो जाते। जब बछड़े पूर्ण रूप से चारा खाने लगते तभी किसान ब उसके परिवार बाले मन से खाना खाने लगते।
आहिस्ता आहिस्ता बछड़े बड़े हो गए समय बैल बन गए।
किसान बहुत खुश था कि उसके पास दो बैल हैं। गाँब के लोग भी बातें करते कि किसान के दिन अब अच्छे आ रहे हैँ। अब किसान खुश रहा करेगा।
किसान ने दो घंटों खरीदी और बैलों के गले में बांद दी।
घण्टियों की आबाज से ही किसान की पत्नी को पता चल जाता कि बैल जंगल से चार कर आ गए हैं।
एक दिन किसान ने सोचा कि अब समय आ गया है कि बैलों को हल से जोता जाए।
अँकल बैल को कैसे जोता जाता है ? एक छोटे से बच्चे ने पुछा।
बेटे हल खेत को जोतने बाली यंतिरिका होती है
किसान और उसकी पत्नी ने सभी तैयारों की और दोनों बैलों को खेत में ले जा कर एक नारियल फोड़ा
, प्रार्थना की और बैलों को हल से जोड़ा। परन्तु ये क्या "दीनू " तो चुपचाप शांति से हल से जुड़ा खड़ा है परन्तु "दिवेश " हल से जुड़ ही नहीं रहा और हल को तोड़ कर भागने की कोशिश कर रहा है।
किसान ने बहुत कोशिश की परन्तु सफलता न मिली। वह निराश हो गया। कई दिन यही सिलसिला चलता रहा परन्तु "दिवेश" जिम्मेबारी लेने को तैयार ही नहीं था।
एक दिन हार कर किसान ने "दिवेश " को खुला छोड़ दिया। "दिवेश" बहुत खुश था। जंगल में घूमता ,अपनी मर्जी की घास खाता, नदी से पानी पीता और अपनी मर्जी से खुले जंगल में सो जाता। आजादी ही आजादी। कोई रोक टॉक नहीं कोई जिम्मेबारी नहीं।
छः महीने बीत गए बड़े माझे से। एक दिन 'दिवेश " अपने पुरे मन से जंगल मैं भाग रहा था ताजा कि इसके सीँग एक झाड़ी ममें फंस गए। "दिवेश" ने बहुत कोशिश कि सीँग छूट जाए परन्तु सींग नहीं छूटे बल्कि एक सींग टूट गया। बहुत दर्द हुआ। बहुत खून बहा। "दिवेश" बहुत तड़फा। बहुत चिल्लाया। परन्तु जंगल में वह अकेला था इस लिए कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आया। किसान को भी पता न लगा। घाब से खून बहता रहा। थोड़े दिनों के बाद घाब में कीड़े पैदा हो गए।
आहिस्ता, आहिस्ता यह कीड़े सारे शरीर मैं फेल गए और "दिवेश " की असमय मौत हो गई।
अब "दीनू" की सुनो। "दीनू " सुबह ताजा हरा चारा खाता। किसान या उसकी पत्नी हर रोज़ उसकी मालिश करती। "दीनू" और किसान फिर खेत मैं चले जाते। किसान उसे बड़े प्यार से हल से जोतता और अपना खेत की बोयई करता। दोपहर को किसान अपना खाना खता तो 'दीनू" को भी पेड़ की छाया के नीचे बांड देता। हरा चारा डालता, पीने के लिए पानी डालता। संध्या समय "दीनू " ब "किसान दोनों घर आते। किसान का बीटा दीनू की मालिश करता और चारा डालता।
फिर "दीनू " आराम से सो जाता। जब "दीनू" बीमार होता किसान भाग कर साथ बाले गायों से डॉक्टर को लेकर आता और दवाई दारू करता। तब तक घर में ख़ुशी नहीं आती जब तक ":दीनू " ठीक नहीं हो जाता। "दीनू" था तो बैल परन्तु सभी उससे घर के सदस्य की तरह ही प्यार करते।
बच्चो जो बचे अपनी जिमेदारी को समझते हैं अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हैं वह जीवन मे सुख भोगते हैं और उनका जीवन भी लम्बा होता है।
आप "दीनू" बनोगे या "दिवेश"
अंकल "दीनू "
माता पिता किसान है हमारा बेलगाम आजाद गैर जिम्मेबार व्यवहार "दिवेश " जिम्मेबार व्यवहार अनुशाषित जीवन "दीनू " है।
अब बच्चों के माता पिता आते हैं और पूछते हैं की आप ने बच्चों को क्या कहा। बच्चे भी मुस्कराते हैं मैं भी। यह कहानी तो मुझे और बच्चों को पता है। परन्तु उनके व्यव्हार का बदलाब माता पिता को महसूस हो रहा है।