मौन का महत्व समझो। केवल सुनो। कम बोलो। आहिस्ता बोलो। दूसरों को बोलने दें। शब्दों का महत्व समझो। यहाँ महसूस हो कि शब्द सुनने बाले के ज्ञान का स्तर उतना नहीं है जो आपका है तो सबसे पहले दिमागी तौर पर अपने आप को उस के लेबल पर लाईये फिर उसी के ज्ञान के अनुसार बात करे
ऐसा न करने से आप अपनी व् सुनने बाले की ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं। निष्क्रष क्या होगा ? बिना किसी मुद्दे के बहस। बेबजह मानसिक तनाब। मुद्दों पर चर्चा करना बुद्धिमानों और ज्ञान कारों की कला है। बिना मुद्दे के बहस करना अज्ञानों की निशानी है। जितना इससे बचोगे उतनी मन की शांति बढ़ेगी , एकाग्रता बढ़ेगी , समृद्धि (धन दौलत ) बढ़ेगी। मानसिक तनाब, मानसिक चंचलता में कमी होगी।
समय का सदुपयोग बढेगा , समय का दुर्पयोग घटेगा।
एक प्रोफेसर ने बताया कि यह कैसे होता है। अधिकतर लोगों की परेशानी अपने बूढ़े बज़ुर्ग माँ बाप को लेकर देखी गई है। यह लोग ज्यादातर ज़बां नौकरी पेशा या बिज़नेस करने बाले होते हैं। इनका करियर और िजन्दगी दोनों की शुरुआत होती है। स्कूल , कॉलिज में मौज की होती है। माँ बाप फीस दे देते हैं पाकेट मनी देते हैं।
स्कूल , कालिज से निकलने के बाद जैसे ही यथार्थ यानि असली दुनिया में कदम रखते हैं पैसे कमाने पड़ते है यहाँ पर काम करते है बहां टारगेट पुरे करने पड़ते हैं काम की लगाम पड़ती है जिम्मेबारी का बोझ बढ़ता जाता है तो यह तिलमिला जाते हैं और सोचने लगते हैं कि बड़े बज़ुर्ग माँ बाप जमाना आसान था। हमारे जमाने में कठिनाई अधिक हो गई हैं। जब भी काम काज कर के घर आते हैं तो पहला ख्याल मन में आता है कि घर मे जो लोग हैं बह सुखी हैं और मुझे काम करना पद रहा है।
ऐसा नहीं है बच्चो। लाखों सालों से सृष्टि चली आ रही है। सभी के माँ बाप होते हैं। माँ बाप दृष्टा (दिखने बाले ) रब है और रब अदृष्टा (न दिखने बाल) भगवान। जैसे अमिताभ बचन जी कहते है माँ बाप मर कर भी कहीं नहीं जाते। हम एक लम्भी कड़ी का हिस्सा हैं। जितने मर्जी तीरथ कर लीजिए यदि माँ बाप का आशिर्बाद नहीं तो कोई सुख नहीं। प्रकृति ने सृष्टि ही ऐसी बनाई है। बुढ़ापे में शरीर और मानसिक स्तर कमजोर पड़ जाता है इन्द्रियाँ बेबस हो जाती है। इससे व्यव्हार में चिड़चडापन बढ़ जाता है। इस लिए उनके साथ बैठने और उनकी बातें सुनने भर से माँ बाप खुश हो जाते हैं। आशीर्वाद देते हैं। आशीर्वाद से जो ख़ुशी मिलती है बह अंदरुनी ख़ुशी कहीं भी कभी भी महसूस नहीं हुई।
मैं एक ज्ञानबान गवर्नमेंट आफिसर के पास बैठा था। उस आफिसर को उस एरिया के लोग बहुत ही ज्ञानबान समझते थे। आफिसर के पास एक जबान नई शादी शुदा जबां महिला आई और कहने लगी : अंकल आपका बहुत बहुत धन्याबाद आप ने मेरी शादी टूटने से बचा दी है। आफिसर ने बड़ी नम्रता से जवाब दिया : धन्यवाद परम पिता परमात्मा का करो मेरा नहीं। मैं तो माध्यम हूँ। बह लड़की हाथ जोड़ कर नमस्कार करके चली गई।
मैंने उसकी आँखों में आफिसर के लिए आभार देखा।
अब मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी। मैंने पूछना शुरू किया। सर किर्पया बताएं कि इस लड़की की कौन सी समस्या थी जिसका समाधान आपने किया और यह आपका आभार प्रकट करने आई थी।
यह एक लम्बी कहानी है फिर कभी सुनायुंगा। मैंने हठ किया और सारी कहानी सुनाने के िलये मज़बूर किया।
तो ध्यान से सुनो - दो महीने पहले यह लड़की मेरे पास आई थी। मुझे कहने लगी कि मैंने अपने पति से तलाक लेना है। बह मुझे घूमने नहीं लेकर जाता, शॉपिंग नहीं करवाता, इतबार को भी आफिस के काम में मसरूफ रहता है। सास की टोका ताकि ने मेरा दम घोट रखा है , ननद की घर में बेबजह दखलंदाजी बहुत है , सास उसीकी सुनती है , ससुर अपने ही मस्त रहता है।
हाँ देवर थोड़ा हसीं मजाक कर लेता है , बह मुझे अच्छा लगता है , मेरे पति के दोस्त भी अच्छे है।
जेठानी अच्छी है पर उनके बच्चे एक दम शैतान। नाक में दम करे रखते हैं।
सब कुछ सुनने के बाद , मैंने कहा आप अपने पति को लेकर आना उनकी भी सुन लूँ।
यह एक डैम भड़क गयी और बोली "पति ने आप से मिल कर क्या करना है ? मुझे बस उनसे छुटकारा चाहिए। "
मैंने पूछा : आपके परिवार मैं या रिश्तेदारी में किसी ने तलाक लिया है ?
यहां
"नहीं , बह तो डरपोंक हैं , मैं पड़ी लिखी हूँ अपना भला बुरा जानती हूँ। "
मैं मुस्कराया और बोला "पति को लेकर आना आपके तलाक का हल हो जायेगा"
तब यह लड़की कार मैं बैठी और चली गई।
एक हफ्ते के बाद अपने पति को लेकर आई। मैंने इसको कहा :"तुम साथ बाले कमरे में बैठो , मैं बाद में बुलाता हूँ "
यह फिर भड़क उठी , कहने लगी : नहीं मैं भी यहीं बैठूँगी। पति ने समझा भुझा कर दूसरे कमरे मैं बैठने के लिए राजी कर ली। बह दूसरे कमरे मैं चली गई। टेलीविज़न देखती रही।
अब मैंने पति से पूछा : एहि बुरी है आपको नापसंद है ? नहीं। बहुत अच्छी है।
पर यह कहती आप उसे समय नहीं देते? सर मैं सुबह से शाम तक आफिस में रहता हूँ यह मुझे 10 -15 फोन करती है और एक ही बात होती है "घर आ जाओ कहीं घूमने चलेंगे " भला सोचो कि काम करेंगे पैसे आएंगे घूमने फिरने से नहीं । पैसे आएंगे जीवन की गाड़ी चलेगी । अब जब शाम को थका हार घर आता हूँ बजाये इसके की पानी का गिलास ल कर पिलाये, चाय पिलाये , यह सारे दिन में मुहले में हुयी गतिविदियां सुनती है , माँ की शिकायतें , अपनी शिकायतें। यही रोजाना की रूटीन है। सुबह मैंने आफिस जाना होता है यह या तो भजन गति होती है या मंदिर चली जाती है बजाय इसके कि
मेरे घऱ आने पर मुझे एक घंटा आराम करने दे उसके बाद मेरा मूड फ्रेश हो जायेगा ऑफिस का असर काम होगा घर के माहौल में ढल जायूँगा। पहले एक घंटे मैं ही शिकायतों का ढेर लगा देती है। शिकायतें भी एक ही तरह की रोज़। माँ कहती है "तू बदल गया है शादी के बाद मुझे पूछता नहीं" पत्नी कहती है "आफिस से घर आ जा घूमने फिरने चलेँगे " बॉस कहता है "काम पूरा न हुआ तो तन्खाह काट लूँगा। तन्खाह काम लाया तो माँ और पत्नी दोनों थानेदार की तरह पूछेंगी - तन्खाह कम क्यों है ? मैं बताओ क्या करूँ ?"
ऑफिसर ने कहा : मैंने सुन लिया है समझ लिया है।
मैंने दूसरे कमरे से महिला को बुलाया और एक पर्ची दे दी जिस पर लिखा था
1. अपने परिवार की एक बड़ी फोटो खिचबाओ जिसमे सब खुश हों। इस फोटो को अपने ड्राइंग रूम लगाओ और दिन में काम से काम 10 बार देखो और मन मैं बोलो "हम सब खुश हैं परम पिता परमात्मा ने कितना अच्छा परिवार दिया है मुझे। परम पिता परमात्मा मैं आपकी धन्यबादी हूँ। "
2. एक हांड़ी में शहद भरकर उसके ऊपर लाल कपडा बाँध कर अपने बैडरूम मैं रखें।
3. पति के सहयोग के लिए अपनी आदतों में बदलाब लाएं : पैसा भी जरूरी है परिवार भी जरूरी है जिसके रिश्ते नाते नहीं उसके पैसे का क्या लाभ।
4 सास, ससुर, ननद या किसी और के बारे में जो भी गीले शिकबे हैं बह एक कागज पर लिखें।
फिर दो हफ्ते बाद यह महिला मेरे पास आयी और कहा की किये मुताबक किया है उससे फरक पड़ा है। कागज पर 10 -12 पेज लिखे थे। मैंने बोह सब पेज अपने पास रख लिए क्यूंकि उनमे सभी के प्रति कड़वाहट ही थी।
अब मैंने इस महिला को एक सफ़ेद कागज दिया और कहा जो मैं बोलूँ लिखती जाओ :
मेरी प्यारी व् पूज्य सासु माताजी ,
मैं अपने माता पिता जी के घर से आपके घर आ गयी हूँ। अब आप ही मेरे माता पिता हैं। मुझे अपना परिवार से आप के परिवार में एडजस्ट होने में समय लगेगा। कृपया यह समय मुझे दें। मैं प्रण करती हूँ कि मैं अपने आप को अपने नए परिवार के काबिल बना लुंगी। थोड़ा समय लगेगा। लड़की का ससुराल ही जीवन है संसार का सच यही है।
यदि कोई गलती हो जाये तो कृपा करके प्यार से समझा दें जी। मैं समझ जायुंगी। आप बड़े है दुनिया देखि है मैं तो बची हूँ।
आपकी बेटी
इस पात्र को लिखते महिला ने बिरोध तो बहुत किया परन्तु आज कितनी खुश है।
पड़ने बाले भी इस पत्र और तरीकों को अपना जीवन बदलने और सुधरने के लिए प्रयोग में लाएं। दूसरों को सुधरने की बजाये अपने सोच को बदलने से जीवन बदल जाता है। कोशिश करें
ऐसा न करने से आप अपनी व् सुनने बाले की ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं। निष्क्रष क्या होगा ? बिना किसी मुद्दे के बहस। बेबजह मानसिक तनाब। मुद्दों पर चर्चा करना बुद्धिमानों और ज्ञान कारों की कला है। बिना मुद्दे के बहस करना अज्ञानों की निशानी है। जितना इससे बचोगे उतनी मन की शांति बढ़ेगी , एकाग्रता बढ़ेगी , समृद्धि (धन दौलत ) बढ़ेगी। मानसिक तनाब, मानसिक चंचलता में कमी होगी।
समय का सदुपयोग बढेगा , समय का दुर्पयोग घटेगा।
एक प्रोफेसर ने बताया कि यह कैसे होता है। अधिकतर लोगों की परेशानी अपने बूढ़े बज़ुर्ग माँ बाप को लेकर देखी गई है। यह लोग ज्यादातर ज़बां नौकरी पेशा या बिज़नेस करने बाले होते हैं। इनका करियर और िजन्दगी दोनों की शुरुआत होती है। स्कूल , कॉलिज में मौज की होती है। माँ बाप फीस दे देते हैं पाकेट मनी देते हैं।
स्कूल , कालिज से निकलने के बाद जैसे ही यथार्थ यानि असली दुनिया में कदम रखते हैं पैसे कमाने पड़ते है यहाँ पर काम करते है बहां टारगेट पुरे करने पड़ते हैं काम की लगाम पड़ती है जिम्मेबारी का बोझ बढ़ता जाता है तो यह तिलमिला जाते हैं और सोचने लगते हैं कि बड़े बज़ुर्ग माँ बाप जमाना आसान था। हमारे जमाने में कठिनाई अधिक हो गई हैं। जब भी काम काज कर के घर आते हैं तो पहला ख्याल मन में आता है कि घर मे जो लोग हैं बह सुखी हैं और मुझे काम करना पद रहा है।
ऐसा नहीं है बच्चो। लाखों सालों से सृष्टि चली आ रही है। सभी के माँ बाप होते हैं। माँ बाप दृष्टा (दिखने बाले ) रब है और रब अदृष्टा (न दिखने बाल) भगवान। जैसे अमिताभ बचन जी कहते है माँ बाप मर कर भी कहीं नहीं जाते। हम एक लम्भी कड़ी का हिस्सा हैं। जितने मर्जी तीरथ कर लीजिए यदि माँ बाप का आशिर्बाद नहीं तो कोई सुख नहीं। प्रकृति ने सृष्टि ही ऐसी बनाई है। बुढ़ापे में शरीर और मानसिक स्तर कमजोर पड़ जाता है इन्द्रियाँ बेबस हो जाती है। इससे व्यव्हार में चिड़चडापन बढ़ जाता है। इस लिए उनके साथ बैठने और उनकी बातें सुनने भर से माँ बाप खुश हो जाते हैं। आशीर्वाद देते हैं। आशीर्वाद से जो ख़ुशी मिलती है बह अंदरुनी ख़ुशी कहीं भी कभी भी महसूस नहीं हुई।
मैं एक ज्ञानबान गवर्नमेंट आफिसर के पास बैठा था। उस आफिसर को उस एरिया के लोग बहुत ही ज्ञानबान समझते थे। आफिसर के पास एक जबान नई शादी शुदा जबां महिला आई और कहने लगी : अंकल आपका बहुत बहुत धन्याबाद आप ने मेरी शादी टूटने से बचा दी है। आफिसर ने बड़ी नम्रता से जवाब दिया : धन्यवाद परम पिता परमात्मा का करो मेरा नहीं। मैं तो माध्यम हूँ। बह लड़की हाथ जोड़ कर नमस्कार करके चली गई।
मैंने उसकी आँखों में आफिसर के लिए आभार देखा।
अब मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी। मैंने पूछना शुरू किया। सर किर्पया बताएं कि इस लड़की की कौन सी समस्या थी जिसका समाधान आपने किया और यह आपका आभार प्रकट करने आई थी।
यह एक लम्बी कहानी है फिर कभी सुनायुंगा। मैंने हठ किया और सारी कहानी सुनाने के िलये मज़बूर किया।
तो ध्यान से सुनो - दो महीने पहले यह लड़की मेरे पास आई थी। मुझे कहने लगी कि मैंने अपने पति से तलाक लेना है। बह मुझे घूमने नहीं लेकर जाता, शॉपिंग नहीं करवाता, इतबार को भी आफिस के काम में मसरूफ रहता है। सास की टोका ताकि ने मेरा दम घोट रखा है , ननद की घर में बेबजह दखलंदाजी बहुत है , सास उसीकी सुनती है , ससुर अपने ही मस्त रहता है।
हाँ देवर थोड़ा हसीं मजाक कर लेता है , बह मुझे अच्छा लगता है , मेरे पति के दोस्त भी अच्छे है।
जेठानी अच्छी है पर उनके बच्चे एक दम शैतान। नाक में दम करे रखते हैं।
सब कुछ सुनने के बाद , मैंने कहा आप अपने पति को लेकर आना उनकी भी सुन लूँ।
यह एक डैम भड़क गयी और बोली "पति ने आप से मिल कर क्या करना है ? मुझे बस उनसे छुटकारा चाहिए। "
मैंने पूछा : आपके परिवार मैं या रिश्तेदारी में किसी ने तलाक लिया है ?
यहां
"नहीं , बह तो डरपोंक हैं , मैं पड़ी लिखी हूँ अपना भला बुरा जानती हूँ। "
मैं मुस्कराया और बोला "पति को लेकर आना आपके तलाक का हल हो जायेगा"
तब यह लड़की कार मैं बैठी और चली गई।
एक हफ्ते के बाद अपने पति को लेकर आई। मैंने इसको कहा :"तुम साथ बाले कमरे में बैठो , मैं बाद में बुलाता हूँ "
यह फिर भड़क उठी , कहने लगी : नहीं मैं भी यहीं बैठूँगी। पति ने समझा भुझा कर दूसरे कमरे मैं बैठने के लिए राजी कर ली। बह दूसरे कमरे मैं चली गई। टेलीविज़न देखती रही।
अब मैंने पति से पूछा : एहि बुरी है आपको नापसंद है ? नहीं। बहुत अच्छी है।
पर यह कहती आप उसे समय नहीं देते? सर मैं सुबह से शाम तक आफिस में रहता हूँ यह मुझे 10 -15 फोन करती है और एक ही बात होती है "घर आ जाओ कहीं घूमने चलेंगे " भला सोचो कि काम करेंगे पैसे आएंगे घूमने फिरने से नहीं । पैसे आएंगे जीवन की गाड़ी चलेगी । अब जब शाम को थका हार घर आता हूँ बजाये इसके की पानी का गिलास ल कर पिलाये, चाय पिलाये , यह सारे दिन में मुहले में हुयी गतिविदियां सुनती है , माँ की शिकायतें , अपनी शिकायतें। यही रोजाना की रूटीन है। सुबह मैंने आफिस जाना होता है यह या तो भजन गति होती है या मंदिर चली जाती है बजाय इसके कि
मेरे घऱ आने पर मुझे एक घंटा आराम करने दे उसके बाद मेरा मूड फ्रेश हो जायेगा ऑफिस का असर काम होगा घर के माहौल में ढल जायूँगा। पहले एक घंटे मैं ही शिकायतों का ढेर लगा देती है। शिकायतें भी एक ही तरह की रोज़। माँ कहती है "तू बदल गया है शादी के बाद मुझे पूछता नहीं" पत्नी कहती है "आफिस से घर आ जा घूमने फिरने चलेँगे " बॉस कहता है "काम पूरा न हुआ तो तन्खाह काट लूँगा। तन्खाह काम लाया तो माँ और पत्नी दोनों थानेदार की तरह पूछेंगी - तन्खाह कम क्यों है ? मैं बताओ क्या करूँ ?"
ऑफिसर ने कहा : मैंने सुन लिया है समझ लिया है।
मैंने दूसरे कमरे से महिला को बुलाया और एक पर्ची दे दी जिस पर लिखा था
1. अपने परिवार की एक बड़ी फोटो खिचबाओ जिसमे सब खुश हों। इस फोटो को अपने ड्राइंग रूम लगाओ और दिन में काम से काम 10 बार देखो और मन मैं बोलो "हम सब खुश हैं परम पिता परमात्मा ने कितना अच्छा परिवार दिया है मुझे। परम पिता परमात्मा मैं आपकी धन्यबादी हूँ। "
2. एक हांड़ी में शहद भरकर उसके ऊपर लाल कपडा बाँध कर अपने बैडरूम मैं रखें।
3. पति के सहयोग के लिए अपनी आदतों में बदलाब लाएं : पैसा भी जरूरी है परिवार भी जरूरी है जिसके रिश्ते नाते नहीं उसके पैसे का क्या लाभ।
4 सास, ससुर, ननद या किसी और के बारे में जो भी गीले शिकबे हैं बह एक कागज पर लिखें।
फिर दो हफ्ते बाद यह महिला मेरे पास आयी और कहा की किये मुताबक किया है उससे फरक पड़ा है। कागज पर 10 -12 पेज लिखे थे। मैंने बोह सब पेज अपने पास रख लिए क्यूंकि उनमे सभी के प्रति कड़वाहट ही थी।
अब मैंने इस महिला को एक सफ़ेद कागज दिया और कहा जो मैं बोलूँ लिखती जाओ :
मेरी प्यारी व् पूज्य सासु माताजी ,
मैं अपने माता पिता जी के घर से आपके घर आ गयी हूँ। अब आप ही मेरे माता पिता हैं। मुझे अपना परिवार से आप के परिवार में एडजस्ट होने में समय लगेगा। कृपया यह समय मुझे दें। मैं प्रण करती हूँ कि मैं अपने आप को अपने नए परिवार के काबिल बना लुंगी। थोड़ा समय लगेगा। लड़की का ससुराल ही जीवन है संसार का सच यही है।
यदि कोई गलती हो जाये तो कृपा करके प्यार से समझा दें जी। मैं समझ जायुंगी। आप बड़े है दुनिया देखि है मैं तो बची हूँ।
आपकी बेटी
इस पात्र को लिखते महिला ने बिरोध तो बहुत किया परन्तु आज कितनी खुश है।
पड़ने बाले भी इस पत्र और तरीकों को अपना जीवन बदलने और सुधरने के लिए प्रयोग में लाएं। दूसरों को सुधरने की बजाये अपने सोच को बदलने से जीवन बदल जाता है। कोशिश करें